क्षमा करो हे कृष्ण !
क्योंकि आसक्ति मात्र ही रही
मेरी कर्तव्य प्रेरणा
और वर्जित किया था तुमने
कहा था इसे समस्त दुखों का कारण.
क्षमा करो हे लीला पुरुषोत्तम !
इसलिये भी
कि स्व के स्थापन मात्र
में ही सन्नद्ध रहा मेरा संपूर्ण
और अहंकारमुक्त तुम्हारे शरणागत को ही
मिलती है चिर अभीप्सित सुख की छाँव,
ऐसा उपदेशित किया था तुमने.
क्षमा करो हे पार्थ-सारथि !
प्रयत्न ही एकमात्र सहारा था
क्योंकि
कभी भी स्वतः नहीं खुले
मेरा जन्मस्थल बनी
काल कोठरी के द्वार
और इसलिये भी क्योंकि
जिसे तुमने क्षणभंगुर, मरीचिका-वत
माया कहा
उसी को पाने की चाह
व्यक्त करती रही
मेरे वज़ूद को.
अब??
और अब भी,
सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों के इस गर्त में
डूबा मैं
(तुमने तो आगाह ही किया था)
अब भी नहीं समझ पाता कि
अपने निजत्व को
किसी भी अनजान / कल्पित तुम में
विलीन कर देने के
मेरे मोक्ष में
मेरा कुछ क्या होगा?
और इसीलिये,
हाँ, ठीक इसीलिये ही
तुम्हारी सभी वर्जनाओं,
उपदेशों
और लीलाओं को
अस्वीकार करना मेरे लिये अनिवार्य था.
क्योंकि मैं अपने रथ की वल्गाऎं
किसी को नहीं दे सकता था ,
ध्रुव विजय की शर्त पर भी नहीं.
और अब जबकि
मैं-
तुम्हारे बनाये मानदण्डों पर नीच,
निर्देशित पथ से भ्रष्ट,
लीला से नासमझ मैं,-
फड़फड़ाता हूँ
तुम और तुम्हारे बन्दीजनों की ज्ञान/गर्व (अहंकार?)
भरी स्मित के दंश
से पीड़ित हो,
तो
इन सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों का अपनापन ही
मुझे अपने अन्क में समेटता है
और कराता है युद्ध का पुनरारंभ,
एक पदाति सैनिक की तरह ही सही
पर एक अपना युद्ध
जिसकी हार और जीत
दोनों मेरी अपनी होंगी
किसी लीलाधर के
भ्रूविलास की कृपा नहीं.

1 comment:
आपका ब्लॉग पढ़ा बहुत अच्छा लगा ..और आप ने मेरी कविता को दिल से सराहा उसके लिए शुक्रिया आपका इ मेल एड्रेस नही मिला इस लिए यहाँ लिखना पड़ा ..जी हाँ उलझने मैंने ही लिखी है धन्यवाद मेरा अपना ब्लॉग है ..
http://ranjanabhatia.blogspot.com/
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