Thursday, November 10, 2011
Saturday, February 19, 2011
Tuesday, June 16, 2009
एक उदास कविता
एक उदास कविता
जिन्दगी,
एक तस्वीर सादा,
कुछ लकीरें उकेरीं,
कुछ सफेद, कुछ साँवरी.
इन्तज़ार में कि
सपनीले रँगों से भरे कोई.
हो गयी बदरंग इन्तज़ार में ही,
मुई.
Saturday, February 21, 2009
क्षमा करो हे कृष्ण !
क्योंकि आसक्ति मात्र ही रही
मेरी कर्तव्य प्रेरणा
और वर्जित किया था तुमने
कहा था इसे समस्त दुखों का कारण.
क्षमा करो हे लीला पुरुषोत्तम !
इसलिये भी
कि स्व के स्थापन मात्र
में ही सन्नद्ध रहा मेरा संपूर्ण
और अहंकारमुक्त तुम्हारे शरणागत को ही
मिलती है चिर अभीप्सित सुख की छाँव,
ऐसा उपदेशित किया था तुमने.
क्षमा करो हे पार्थ-सारथि !
प्रयत्न ही एकमात्र सहारा था
क्योंकि
कभी भी स्वतः नहीं खुले
मेरा जन्मस्थल बनी
काल कोठरी के द्वार
और इसलिये भी क्योंकि
जिसे तुमने क्षणभंगुर, मरीचिका-वत
माया कहा
उसी को पाने की चाह
व्यक्त करती रही
मेरे वज़ूद को.
अब??
और अब भी,
सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों के इस गर्त में
डूबा मैं
(तुमने तो आगाह ही किया था)
अब भी नहीं समझ पाता कि
अपने निजत्व को
किसी भी अनजान / कल्पित तुम में
विलीन कर देने के
मेरे मोक्ष में
मेरा कुछ क्या होगा?
और इसीलिये,
हाँ, ठीक इसीलिये ही
तुम्हारी सभी वर्जनाओं,
उपदेशों
और लीलाओं को
अस्वीकार करना मेरे लिये अनिवार्य था.
क्योंकि मैं अपने रथ की वल्गाऎं
किसी को नहीं दे सकता था ,
ध्रुव विजय की शर्त पर भी नहीं.
और अब जबकि
मैं-
तुम्हारे बनाये मानदण्डों पर नीच,
निर्देशित पथ से भ्रष्ट,
लीला से नासमझ मैं,-
फड़फड़ाता हूँ
तुम और तुम्हारे बन्दीजनों की ज्ञान/गर्व (अहंकार?)
भरी स्मित के दंश
से पीड़ित हो,
तो
इन सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों का अपनापन ही
मुझे अपने अन्क में समेटता है
और कराता है युद्ध का पुनरारंभ,
एक पदाति सैनिक की तरह ही सही
पर एक अपना युद्ध
जिसकी हार और जीत
दोनों मेरी अपनी होंगी
किसी लीलाधर के
भ्रूविलास की कृपा नहीं.
Tuesday, January 6, 2009
यह विरह के चार खूबसूरत पल
जब …
जब तुमसे दूर रहकर भी
तुम्हे महसूसता हूँ अपने भीतर,
रँगता हूँ मिलन को
अपनी कल्पना के
शोख,
स्निग्ध,
चटकीले,
महकते
रंगों से
और दुलराता हूँ
जब उम्मीद की
उन कोंपलों को
जिन्होने सिर उठाया है
तुम्हारी जमीन पाकर.
माफ़ करना,
तब..
ठीक तब तब
ये पल तुमसे ज्यादा
मादक हो उठते हैं.
और तब सहम कर ही
मैं इन्हे कर देता हूँ तुम्हें नज़र
और रीत जाता हूँ…
तुम्हे खुद में भरकर,
खुद को पाने के लिये.
Sunday, December 21, 2008

धूम धुप्प धूम धुप्प …
वो देखो
आसमान के सूरज को
धरती पर उतार लिया है
मैनें
और पहिया बनाकर मेरा बेटा
दौड़ाता ले जा रहा है
उसे मेरे खेतों मे
जहाँ मैने सपनों की फसल उगा रखी है
छल छल कल कल छल छल …
छल छल कल कल छल छल …
अरे वो देखो
मेरे साथी की पेशानी से टपका पसीना
अब नदी बन उमड़ा,
चला क्षितिज़ पर सूखते दीखते
समन्दर को भरने उफ़नाने.
मेरी मुसीबतों,
तुम्हारे सदके
तुमने हमें
तुम से जीतना
और
जीना सिखा दिया.
Tuesday, July 24, 2007
तुमसे बातें किये हुए.
झगड़े किये हुए,
साथ बैठ कर टूटे सपनों की किरचें बटोरे हुए,
उम्मीद की कोंपलो को सहलाये हुए,
बहुत दिन हुए खुश हुए.
बहुत दिन हुए,
छप्पर से फ़िसली धूप को
रोम रोम अन्जुरी किये हुए,
अम्मा के चूल्हे से उछले फ़ुल्के को
आसमान तक लपके
हाथ उठाये हुए,
बाबा के कन्धे पर बैठ कर
आसमान चूमे हुए,
क्षितिज़ पद चिन्हों से
मिटाये बनाये हुए बहुत दिन हुए,
बहुत दिन हुए खुश हुए.
