Tuesday, June 16, 2009

एक उदास कविता


एक उदास कविता

जिन्दगी,
एक तस्वीर सादा,
कुछ लकीरें उकेरीं,
कुछ सफेद, कुछ साँवरी.
इन्तज़ार में कि
सपनीले रँगों से भरे कोई.
हो गयी बदरंग इन्तज़ार में ही,
मुई.

Saturday, February 21, 2009


क्षमा करो हे कृष्ण !
क्योंकि आसक्ति मात्र ही रही
मेरी कर्तव्य प्रेरणा
और वर्जित किया था तुमने
कहा था इसे समस्त दुखों का कारण.
क्षमा करो हे लीला पुरुषोत्तम !
इसलिये भी
कि स्व के स्थापन मात्र
में ही सन्नद्ध रहा मेरा संपूर्ण
और अहंकारमुक्त तुम्हारे शरणागत को ही
मिलती है चिर अभीप्सित सुख की छाँव,
ऐसा उपदेशित किया था तुमने.

क्षमा करो हे पार्थ-सारथि !
प्रयत्न ही एकमात्र सहारा था
क्योंकि
कभी भी स्वतः नहीं खुले
मेरा जन्मस्थल बनी
काल कोठरी के द्वार
और इसलिये भी क्योंकि
जिसे तुमने क्षणभंगुर, मरीचिका-वत
माया कहा
उसी को पाने की चाह
व्यक्त करती रही
मेरे वज़ूद को.
अब??

और अब भी,

सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों के इस गर्त में
डूबा मैं
(तुमने तो आगाह ही किया था)
अब भी नहीं समझ पाता कि
अपने निजत्व को
किसी भी अनजान / कल्पित तुम में
विलीन कर देने के
मेरे मोक्ष में
मेरा कुछ क्या होगा?
और इसीलिये,

हाँ, ठीक इसीलिये ही
तुम्हारी सभी वर्जनाओं,
उपदेशों
और लीलाओं को
अस्वीकार करना मेरे लिये अनिवार्य था.
क्योंकि मैं अपने रथ की वल्गाऎं
किसी को नहीं दे सकता था ,
ध्रुव विजय की शर्त पर भी नहीं.
और अब जबकि
मैं-
तुम्हारे बनाये मानदण्डों पर नीच,
निर्देशित पथ से भ्रष्ट,
लीला से नासमझ मैं,-
फड़फड़ाता हूँ
तुम और तुम्हारे बन्दीजनों की ज्ञान/गर्व (अहंकार?)
भरी स्मित के दंश
से पीड़ित हो,
तो
इन सभी पराजयों,
असफलताओं,
दुखों का अपनापन ही
मुझे अपने अन्क में समेटता है
और कराता है युद्ध का पुनरारंभ,
एक पदाति सैनिक की तरह ही सही
पर एक अपना युद्ध
जिसकी हार और जीत
दोनों मेरी अपनी होंगी
किसी लीलाधर के
भ्रूविलास की कृपा नहीं.

Tuesday, January 6, 2009


यह विरह के चार खूबसूरत पल
जब …
जब तुमसे दूर रहकर भी
तुम्हे महसूसता हूँ अपने भीतर,
रँगता हूँ मिलन को
अपनी कल्पना के
शोख,
स्निग्ध,
चटकीले,
महकते
रंगों से
और दुलराता हूँ
जब उम्मीद की
उन कोंपलों को
जिन्होने सिर उठाया है
तुम्हारी जमीन पाकर.
माफ़ करना,
तब..
ठीक तब तब
ये पल तुमसे ज्यादा
मादक हो उठते हैं.
और तब सहम कर ही
मैं इन्हे कर देता हूँ तुम्हें नज़र
और रीत जाता हूँ…
तुम्हे खुद में भरकर,
खुद को पाने के लिये.