Tuesday, January 6, 2009


यह विरह के चार खूबसूरत पल
जब …
जब तुमसे दूर रहकर भी
तुम्हे महसूसता हूँ अपने भीतर,
रँगता हूँ मिलन को
अपनी कल्पना के
शोख,
स्निग्ध,
चटकीले,
महकते
रंगों से
और दुलराता हूँ
जब उम्मीद की
उन कोंपलों को
जिन्होने सिर उठाया है
तुम्हारी जमीन पाकर.
माफ़ करना,
तब..
ठीक तब तब
ये पल तुमसे ज्यादा
मादक हो उठते हैं.
और तब सहम कर ही
मैं इन्हे कर देता हूँ तुम्हें नज़र
और रीत जाता हूँ…
तुम्हे खुद में भरकर,
खुद को पाने के लिये.

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