एक उदास कविता
जिन्दगी,
एक तस्वीर सादा,
कुछ लकीरें उकेरीं,
कुछ सफेद, कुछ साँवरी.
इन्तज़ार में कि
सपनीले रँगों से भरे कोई.
हो गयी बदरंग इन्तज़ार में ही,
मुई.
पाठक हूँ लेखक नहीँ , और ना ही प्रशिक्षित हूँ गति, यति, लय, ताल, अभिव्यक्ति के नामचीन मठों में, नियमो से . बस साथ है एक अनुभूति - सहोदरा और विरासत, एक आवाज-खुदकाश्त.
एक उदास कविता
जिन्दगी,
एक तस्वीर सादा,
कुछ लकीरें उकेरीं,
कुछ सफेद, कुछ साँवरी.
इन्तज़ार में कि
सपनीले रँगों से भरे कोई.
हो गयी बदरंग इन्तज़ार में ही,
मुई.