
धूम धुप्प धूम धुप्प …
धूम धुप्प धूम धुप्प …
वो देखो
आसमान के सूरज को
धरती पर उतार लिया है
मैनें
और पहिया बनाकर मेरा बेटा
दौड़ाता ले जा रहा है
उसे मेरे खेतों मे
जहाँ मैने सपनों की फसल उगा रखी है
छल छल कल कल छल छल …
छल छल कल कल छल छल …
अरे वो देखो
मेरे साथी की पेशानी से टपका पसीना
अब नदी बन उमड़ा,
चला क्षितिज़ पर सूखते दीखते
समन्दर को भरने उफ़नाने.
मेरी मुसीबतों,
तुम्हारे सदके
तुमने हमें
तुम से जीतना
और
जीना सिखा दिया.

6 comments:
मेरी मुसीबतों,
तुम्हारे सदके
तुमने हमें
तुम से जीतना
और
जीना सिखा दिया.
सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें
बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
bahut he accha likha hai.....badhaai swikaar kare....
बढिया कविता आपका स्वागत।
.. आपका हार्दिक स्वागत है मेरे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लायें
बधाई स्वीकार करें
हिन्दी चिठ्ठाविश्व में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं…
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